no subject

Time Travelled — 12 months

Peaceful right?

आज रात के बारह बज रहे है और कल मेरे जन्मदिन था। जानते हो इस बार क्या खास था? यही की सिर्फ दस लोगों ने मुझे जन्मदिन की शुभकामनाएं दी और सिर्फ तीन लोगों ने आज फोन किया जिनमें दो बचपन के मित्र थे और इसके अलावा एक और मित्र का फोन आया था क्योंकि उसने मेरे एक मौसी की बेटी की इंस्टाग्राम पर स्टोरी देख ली थी जोकि मैं नहीं देख सका क्योंकि हम एक दूसरे को फॉलो नहीं करते। मजे की बात यह है कि इस वर्ष मैने केक नहीं काटा जो कि मुझे अच्छी लगी क्योंकि मैं ये कई वर्षों से प्रयास कर रहा था कि ऐसा हो। लेकिन प्रत्येक वर्ष मां और पिता जी जबरदस्ती मुझसे ही केक मंगवाते थे या फिर मेरे फेंटास्टिक फोर व्हाट्सएप ग्रुप के तीन मित्र मिल कर केक कटवाते थे। तो दो केक तो मैं प्रत्येक वर्ष काटता ही था पर इस वर्ष ऐसा कुछ नहीं हुआ। घरवालों का तो पता नहीं परंतु मित्रो से ऐसी अपेक्षा नहीं थी क्योंकि इन सभी के जन्म दिवस पर उनसे अधिक उत्सुकता मै दिखाता था कुछ करने का या कही घूमने जाने का प्लान जरूर बनाता, सबसे कम अगर कुछ करता तो केक जरूर कटवाता चाहे कितने ही दिनों से बात न हुई हो या न मिले हो उस दिन तो अवश्य मिलना होता। शायद इसीलिए कुछ उम्मीद थी उनसे जो पूरी नहीं हुई, पर अब क्या ही फर्क पड़ता है। इस प्रसंग पर एक पुरानी बात याद आ गई एक मित्र हुआ करता था स्कूल के दिनों में जिसका जन्मदिन इसी महीने में पड़ता है और कुछ वर्षों पूर्व जब हमारी बात हुआ करतीं थी तब मैं उसे एक वर्ष बधाई देना भूल गया और उस वक्त वह बहुत नाराज हुआ था। तब मुझे लगता था कि क्या ही बड़ी बात हो गई एक दिन ही तो भुला हूं इससे हमारी दोस्ती तो नहीं बदल जाएगी परंतु वह मित्र बहुत नाराज रहा कई दिनों तक और अब हमारी बात नहीं होती। अब समझ में आ रहा है मेरा वह एक दिन भूलना उसके लिए इतना कष्टकारी क्यों था शायद उसकी अपेक्षाएं मुझसे अधिक रही होंगी जिससे उसके मन आहत हुआ होगा। पर मुझे ऐसा कुछ अधिक कष्ट नहीं हुआ क्योंकि मैने पहले ही कुछ अपेक्षा नहीं रखी थी तो निराश होने का कोई सवाल ही नहीं था। इस लेख को लिखने का कारण सिर्फ यही बताना था कि बढ़ती आयु के साथ साथ मेरे विचार और दूसरों के प्रति अपेक्षाएं भी बदल रही है और परिपक्व हो रहा हूं अब इन सब छोटी चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता। अब तो अपना जन्म दिवस को मनाने का कोई अलग उत्साह भी नहीं रहता। अब कैसी भी परिस्थिति हो सिर्फ "क्या ही फर्क पड़ता है " कह कर आगे बढ़ जाता हूं इससे भूतकाल में घटी घटनाओं का वर्तमान पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। और वर्तमान में कोई परिस्थिति जो मन के अनुकूल नहीं है वह भविष्य पर प्रभाव नहीं डालती।

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